लेखक परिचय : मनोहर श्याम जोशी
मनोहर श्याम जोशी… यह नाम हिंदी साहित्य में किसी पहचान का मोहताज नहीं। सोचते हैं एक पल — एक ऐसा लेखक जिसने उपन्यास भी लिखा, पटकथा भी, और व्यंग्य भी — और हर विधा में अपनी अलग छाप छोड़ी।
उनका जन्म हुआ 9 अगस्त 1935 को अजमेर, राजस्थान में। पर उनकी परवरिश और पहचान कुमाऊँ की पहाड़ियों से जुड़ी रही — वो संस्कृति, वो बोली, वो लोकजीवन — सब कुछ उनके लेखन में झलकता है।
जोशी जी की पढ़ाई-लिखाई लखनऊ विश्वविद्यालय से हुई। शुरुआत में उन्होंने पत्रकारिता की राह पकड़ी। “दिनमान” जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में काम किया। पत्रकारिता ने उन्हें समाज को नज़दीक से देखने का मौका दिया — और यही अनुभव उनके साहित्य की नींव बना।
अब बात करें उनके लेखन की तो… honestly पहले लगता है कि वो बस मनोरंजन कर रहे हैं। हल्का-फुल्का, थोड़ा व्यंग्यात्मक। पर जब ध्यान से पढ़ो तो समझ आता है — हर पंक्ति के पीछे एक गहरी सामाजिक टिप्पणी छुपी है।
उनके प्रमुख उपन्यासों में “कुरु कुरु स्वाहा”, “कसप”, “हरिया हरक्युलीज़ की हैरानी”, और “क्याप” शामिल हैं। “कसप” को तो हिंदी के बेहतरीन आधुनिक उपन्यासों में गिना जाता है — पहाड़ी जीवन, प्रेम, और विडंबना का अद्भुत मेल।
पर जो चीज़ उन्हें सबसे अलग बनाती है वो है — टेलीविज़न पटकथा लेखन। “हम लोग” — हाँ, वही सीरियल जिसने भारतीय टीवी को एक नई दिशा दी — उसकी पटकथा जोशी जी ने ही लिखी थी। इसके अलावा “बुनियाद” भी उन्हीं की कलम से निकला। मतलब यह है कि उन्होंने हिंदी साहित्य और हिंदी मनोरंजन — दोनों को एक साथ समृद्ध किया।
उनकी भाषा शैली बेहद रोचक है। वो हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी और कुमाऊँनी — सबको मिलाकर एक अनोखा मिश्रण बनाते हैं। पढ़ते वक्त कभी-कभी हँसी आती है, कभी कुछ चुभता है — यही तो उनकी खासियत है।
“सिल्वर वैडिंग” कहानी भी उनकी इसी शैली का नमूना है। मध्यवर्गीय परिवार, पिता-पुत्र के बीच की दूरी, सपने और हकीकत का टकराव — यह सब उन्होंने बड़े ही सहज अंदाज़ में पिरोया है।
जोशी जी का निधन 30 मार्च 2006 को हुआ। पर उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है — शायद और भी ज़्यादा। क्योंकि मध्यवर्गीय जीवन की जो विडंबनाएँ उन्होंने उकेरी थीं, वो आज भी हमारे आसपास बिखरी हैं।
📖 अध्याय सारांश : सिल्वर वैडिंग
कहानी का केंद्रीय पात्र है यशोधर पंत — दिल्ली में एक सरकारी दफ्तर में काम करने वाले, पुरानी सोच के, अनुशासनप्रिय व्यक्ति। वो हर चीज़ में पुरानी परंपराओं को मानते हैं। सुबह जल्दी उठना, दफ्तर समय पर जाना, सादा जीवन जीना — यही उनकी दिनचर्या है।
🔹 किशनदा का प्रभाव
यशोधर बाबू के जीवन पर सबसे गहरा असर पड़ा था उनके पुराने मार्गदर्शक किशनदा का। दिल्ली आने पर किशनदा ने ही उनकी मदद की थी — नौकरी दिलाई, रहने की जगह दी। यशोधर बाबू आज भी उन्हीं के आदर्शों पर चलते हैं।
Toh basically किशनदा उनके लिए एक आदर्श थे — एक ऐसे इंसान जो अकेले रहे, कोई बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं पाली, बस दूसरों की मदद करते रहे।
🔹 परिवार से दूरी
यशोधर बाबू का परिवार बदल चुका है। बच्चे modern हो गए हैं — बेटे अच्छी नौकरियों में हैं, बेटी भी पढ़ी-लिखी है। पत्नी भी अब बच्चों के साथ नई सोच अपनाने लगी हैं।
पर यशोधर बाबू? वो वहीं खड़े हैं — जहाँ थे। घर में उनकी चलती नहीं। हर बात पर “पुरानी सोच” का ठप्पा लग जाता है।
🔹 सिल्वर वैडिंग की तैयारी
घर में शादी की 25वीं सालगिरह — यानी सिल्वर वैडिंग — की तैयारियाँ हो रही हैं। बच्चों ने यह सब खुद organize किया है। पार्टी होगी, केक कटेगा, gifts होंगे।
यशोधर बाबू को यह सब पसंद नहीं। उनके लिए ऐसे आयोजन “दिखावा” हैं। पर घर में उनकी बात कौन सुनता है?
🔹 बेटे का गिफ्ट — कोट
बेटे ने उन्हें एक नया कोट gift किया — western style का। यशोधर बाबू ने पहना भी, पर मन में कहीं एक कसक थी।
🔹 भावनात्मक अंतर्द्वंद्व
कहानी का सबसे गहरा हिस्सा यहाँ है। यशोधर बाबू खुद नहीं समझ पाते कि वो खुश हैं या दुखी। परिवार है, बच्चे सफल हैं, घर अच्छा है — फिर भी एक अजीब सी खालीपन है।
वो किशनदा को याद करते हैं। सोचते हैं — “क्या मैंने सही किया? क्या यही ज़िंदगी थी जो मैं चाहता था?”
🔹 अंत — “यथावत”
कहानी का अंत बड़ा सोचने पर मजबूर करता है। सब कुछ ठीक दिखता है बाहर से — पर यशोधर बाबू अंदर से वही के वही हैं। न बदले, न बदल सके। “समहाउ इम्प्रॉपर” — यही उनकी ज़िंदगी का सार बन गया है।

👤 चरित्र चित्रण (Character Sketch)
🔸 यशोधर पंत (Yashodhar Pant)
यशोधर बाबू इस कहानी के नायक हैं — पर एक ऐसे नायक जो न पूरी तरह सही हैं, न गलत।
व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ:
- परंपराप्रिय — पुरानी रीतियों में गहरी आस्था। सुबह जल्दी उठना, मंदिर जाना, सादा जीना — यही उनकी पहचान है।
- अनुशासित — दफ्तर में समय के पक्के, काम के प्रति ईमानदार। पर यही अनुशासन घर में उन्हें अकेला कर देता है।
- भावनात्मक रूप से अकेले — परिवार के बीच रहते हुए भी एक अजीब अकेलापन। मन की बात कहने वाला कोई नहीं।
- किशनदा के आदर्शों का अनुयायी — उनकी सोच, उनके फैसले — सब किशनदा की छाया में।
- परिवर्तन से डरते हैं — बच्चों की modern सोच उन्हें असहज करती है। पर विरोध करने की ताकत भी नहीं।
- आत्मविरोधाभासी — जानते हैं कि ज़माना बदल रहा है, पर खुद नहीं बदलते। और इसी में उनकी त्रासदी है।
🔸 किशनदा
किशनदा कहानी में प्रत्यक्ष रूप से नहीं हैं, पर उनकी उपस्थिति पूरी कहानी में महसूस होती है।
- वो यशोधर बाबू के आदर्श और मार्गदर्शक थे।
- उन्होंने यशोधर बाबू को दिल्ली में settle होने में मदद की।
- वो खुद अकेले रहे — बिना परिवार, बिना महत्वाकांक्षा।
- उनका जीवन त्याग और सादगी का प्रतीक था।
🔸 यशोधर बाबू की पत्नी
- शुरू में पारंपरिक, पर धीरे-धीरे बच्चों के साथ बदल गईं।
- बच्चों का साथ देती हैं — यशोधर बाबू का नहीं।
- घर की व्यावहारिक ज़रूरतों को समझती हैं।
🔸 बच्चे (संतानें)
- आधुनिक सोच वाले — पढ़े-लिखे, अच्छी नौकरियों में।
- पिता की पुरानी सोच से frustrated हैं।
- प्यार करते हैं पर समझते नहीं — या समझना नहीं चाहते।

📝 Important Points— Exam के लिए
केंद्रीय विषय — पीढ़ी का अंतर (Generation Gap) और मध्यवर्गीय जीवन की विडंबना।
मुख्य conflict — यशोधर बाबू का पुरानी सोच से चिपकना VS परिवार का बदलाव।
“समहाउ इम्प्रॉपर” — यह phrase पूरी कहानी की key है। यशोधर बाबू को हर नई चीज़ “somehow improper” लगती है।
कहानी का tone — व्यंग्यात्मक पर संवेदनशील। हँसाती भी है, सोचने पर मजबूर भी करती है।
परीक्षा में याद रखें — किशनदा का symbolic importance, सिल्वर वैडिंग का irony (खुशी का मौका पर यशोधर बाबू उदास), और कोट का प्रतीकात्मक अर्थ (नई पीढ़ी का पुरानी पीढ़ी पर थोपा हुआ बदलाव)।
📚 सिल्वर वैडिंग : मनोहर श्याम जोशी : अभ्यास प्रश्नोत्तर
NCERT Vitan | Class 12 | Chapter 1
प्रश्न 1: यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों?
यह सवाल पढ़कर पहले मुझे भी लगा — “अरे, दोनों तो एक ही घर में रहते हैं, फिर इतना फर्क क्यों?” पर जब सोचा तो समझ आया…
पत्नी क्यों बदल पाईं:
पत्नी का जुड़ाव सीधे परिवार और बच्चों से था। उनकी पहचान घर से थी — और जब बच्चे बदले, तो घर बदला, तो वो भी बदल गईं। उनके पास कोई बाहरी आदर्श नहीं था जिसे वो जीवन भर ढोती रहें।
बच्चों की खुशी में उनकी खुशी थी। बेटे की तरक्की, बेटी की पढ़ाई — यह सब उन्हें अच्छा लगा। तो बदलाव उन्हें खतरा नहीं, अवसर लगा।
यशोधर बाबू क्यों नहीं बदल पाए:
यशोधर बाबू की पूरी सोच, पूरी पहचान किशनदा के आदर्शों पर टिकी थी। सादगी, त्याग, अनुशासन — यही उनका “सही जीवन” था।
अब अगर वो बदलते… तो मानो किशनदा के आदर्शों को नकार देते। यह उनसे नहीं हो सकता था।
इसके अलावा — यशोधर बाबू का पूरा जीवन दफ्तर और बाहरी दुनिया में बीता। घर से उनका भावनात्मक जुड़ाव उतना गहरा नहीं था। इसलिए जब घर बदला, वो उस बदलाव से खुद को जोड़ नहीं पाए।
सरल शब्दों में: पत्नी pragmatic थीं — जो सामने था, उसे स्वीकार किया। यशोधर बाबू idealist थे — जो मन में था, उसे छोड़ नहीं पाए।
प्रश्न 2: ‘जो हुआ होगा’ वाक्य की अर्थ छवियाँ
यह वाक्य छोटा सा है — पर इसमें कितनी गहराई है! मुझे लगा इसे ध्यान से खोलना चाहिए।
अर्थ छवि 1 — अनिश्चितता: यशोधर बाबू खुद नहीं जानते कि उनके जीवन में क्या हुआ, क्यों हुआ। “जो हुआ होगा” — मतलब मुझे पूरी तरह पता भी नहीं, पर मान लेता हूँ।
अर्थ छवि 2 — नियतिवाद (Fatalism): एक भाव यह भी है कि “जो होना था, हो गया।” कोई प्रतिरोध नहीं, कोई सवाल नहीं। जो हुआ, ठीक ही हुआ होगा।
अर्थ छवि 3 — पलायन: सच से मुँह मोड़ने का तरीका। जो बात दर्दनाक है, उसे “जो हुआ होगा” कहकर टाल देना। सोचना नहीं चाहते — इसलिए यह वाक्य।
अर्थ छवि 4 — समझौता: मध्यवर्गीय जीवन का सबसे बड़ा हथियार — समझौता। ना पूरी खुशी, ना पूरा दुख। बस “जो हुआ होगा।”
अर्थ छवि 5 — पीढ़ी का दर्द: किशनदा के जाने के बाद, अपने घर में अकेलेपन के बाद — यशोधर बाबू के पास बचता क्या है? बस यही — “जो हुआ होगा।”
अर्थ छवि 6 — व्यंग्य: लेखक यहाँ subtle irony use करते हैं। पाठक समझता है कि “क्या हुआ होगा” — पर यशोधर बाबू खुद उससे अनजान बने रहते हैं।
प्रश्न 3: ‘समहाउ इंप्रापर’ — व्यक्तित्व और कथ्य से संबंध
यह phrase honestly पूरी कहानी की जान है।
तकिया कलाम क्यों बना:
जब कोई बात बार-बार मन में आती है — बार-बार परेशान करती है — तो वो शब्दों में निकलने लगती है। यशोधर बाबू को हर नई चीज़ “improper” लगती थी — तो यह phrase उनकी सोच का automatic expression बन गया।
व्यक्तित्व से संबंध:
यह phrase बताता है कि यशोधर बाबू के मन में एक fixed standard है — एक पैमाना जो किशनदा ने दिया था। उस पैमाने पर जो खरा नहीं उतरता, वो “इंप्रापर” है।
यह उनकी judgemental nature को दर्शाता है — पर साथ ही यह भी कि वो खुद को हमेशा सही मानते हैं। दूसरे गलत हो सकते हैं, वो नहीं।
कथ्य से संबंध:
कहानी का मूल विषय है — दो पीढ़ियों का टकराव। और “समहाउ इंप्रापर” इसी टकराव का प्रतीक है।
यशोधर बाबू की नज़र में:
- पार्टी करना — इंप्रापर
- Western कोट पहनना — इंप्रापर
- बच्चों का खुलकर जीना — इंप्रापर
पर कहानी का व्यंग्य यह है कि पाठक को लगता है — यशोधर बाबू खुद “समहाउ इंप्रापर” हो गए हैं — अपने ही घर में, अपने ही परिवार में।
प्रश्न 4: किशनदा जैसा मार्गदर्शक — आपके जीवन में किसका योगदान?
(यह प्रश्न व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है — नीचे एक model answer दिया है जिसे आप अपने अनुसार बदल सकते हैं)
जब मैंने यह प्रश्न पढ़ा तो सोचने लगा — हर इंसान की ज़िंदगी में कोई न कोई “किशनदा” ज़रूर होता है।
मेरे जीवन में मेरे दादाजी ने वही भूमिका निभाई जो किशनदा ने यशोधर बाबू के लिए निभाई।
वो हमेशा कहते थे — “मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।” शुरू में यह सुनकर लगता था — बस एक पुरानी कहावत है। पर जब खुद मुश्किलों से गुज़रा, तो उनकी बात याद आई।
उन्होंने मुझे सिखाया कि दिखावे में नहीं, असल काम में ताकत होती है। बड़ी-बड़ी बातें करने से नहीं, चुपचाप काम करते रहने से मंजिल मिलती है।
किशनदा और मेरे दादाजी में एक बात common थी — दोनों ने बिना माँगे रास्ता दिखाया। अपने जीवन से सीख दी, शब्दों से नहीं।
प्रश्न 5: वर्तमान परिवार की संरचना और इस कहानी से सामंजस्य
सच कहूँ तो… यह कहानी आज भी उतनी ही relevant है जितनी तब थी।
जो मेल खाता है:
आज भी घरों में यही होता है। दादा-दादी या माता-पिता एक तरफ — बच्चे दूसरी तरफ। बुज़ुर्गों को smartphone समझ नहीं आता, बच्चों को उनकी “पुरानी बातें” बोरिंग लगती हैं।
Joint family टूट रही है। हर कोई “independent” होना चाहता है। यशोधर बाबू की तरह कई बुज़ुर्ग आज भी अपने ही घर में अकेले हैं।
जो थोड़ा अलग है:
आज की नई पीढ़ी थोड़ी ज़्यादा aware है। कुछ बच्चे parents को समझने की कोशिश करते हैं — उनके साथ time बिताते हैं। यशोधर बाबू के बच्चों में यह थोड़ा कम दिखता है।
मेरा अनुभव:
मेरे घर में भी कभी-कभी यही होता है। जब मैं कुछ नया करता हूँ — घर के बड़ों को कभी-कभी अच्छा नहीं लगता। पर अब मैं समझता हूँ — उनका विरोध नफरत से नहीं, डर से आता है। बदलाव का डर।
प्रश्न 6: कहानी की मूल संवेदना — कौन सी?
तीनों options में से मैं चुनूँगा —
✅ (ख) पीढ़ी का अंतराल
क्यों?
देखो — (क) हाशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य — यह भी है कहानी में, पर यह secondary है। यशोधर बाबू के मूल्य हाशिए पर जा रहे हैं — पर यह इसलिए हो रहा है क्योंकि पीढ़ी बदल गई है।
(ग) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव — यह तो बस एक कारण है, मूल संवेदना नहीं।
पर (ख) पीढ़ी का अंतराल — यही वो धुरी है जिस पर पूरी कहानी घूमती है।
यशोधर बाबू और उनके बच्चों के बीच जो खाई है — वो सिर्फ सोच की नहीं, भावनाओं की भी है। दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं — पर समझ नहीं पाते। और यही दर्द इस कहानी को इतना real बनाता है।
पीढ़ी का अंतराल कोई नई समस्या नहीं — पर जोशी जी ने इसे इतने सहज तरीके से दिखाया है कि पढ़ते वक्त लगता है — “अरे, यह तो मेरे घर की बात है।”
प्रश्न 7: बुज़ुर्गों को नापसंद आधुनिक बदलाव — और उनके कारण
घर में होने वाले बदलाव:
- पहले साथ बैठकर खाना खाते थे — अब हर कोई अपने कमरे में phone लेकर।
- पहले शाम को घर में बातें होती थीं — अब TV या mobile।
- बच्चों का देर रात बाहर रहना।
- त्योहारों पर पूजा की जगह party का बढ़ता चलन।
- बड़ों से permission लेने की बजाय खुद decisions लेना।
विद्यालय के आसपास:
- Online classes ने बच्चों को screen-dependent बना दिया।
- Physical खेल कम, video games ज़्यादा।
- बच्चों में “Sir/Ma’am” की जगह “Hey” जैसे informal संबोधन।
बुज़ुर्गों को अच्छा क्यों नहीं लगता:
पहली बात — भावनात्मक जुड़ाव का डर। उन्हें लगता है technology और modernity ने रिश्तों की गर्माहट छीन ली।
दूसरी बात — अपनी relevance का खोना। जब बच्चे खुद सब decide करने लगते हैं, तो बुज़ुर्गों को लगता है — “हमारी ज़रूरत ही क्या रही?”
तीसरी बात — सांस्कृतिक जड़ों से कटाव। त्योहार, रीति-रिवाज — यह उनकी पहचान थी। उसे बदलते देखना दर्दनाक है।
पर यह भी सच है — हर बदलाव बुरा नहीं होता। ज़रूरत है समझ की, संवाद की।
प्रश्न 8: यशोधर बाबू के बारे में धारणा — कौन सा कथन सही?
मैं समर्थन करता हूँ —
✅ (ख) यशोधर बाबू में द्वंद्व है — इसलिए सहानुभूति ज़रूरी है
तर्क:
पहली बात — अगर यशोधर बाबू पूरी तरह “पुराने और गलत” होते, तो वो कभी वो कोट नहीं पहनते जो बेटे ने दिया। पर उन्होंने पहना। मतलब नया उन्हें खींचता है — पर वो मानते नहीं।
यही तो द्वंद्व है।
दूसरी बात — उनके मूल्य गलत नहीं हैं। अनुशासन, सादगी, ईमानदारी — यह तो अच्छे गुण हैं। बस delivery गलत है। वो इन्हें थोपते हैं, share नहीं करते।
तीसरी बात — (क) को मैं इसलिए नहीं मानता क्योंकि सहानुभूति न देना cruel होगा। वो एक इंसान हैं जो अपने समय में फँसे हैं — villain नहीं।
(ग) को इसलिए नहीं मानता क्योंकि आदर्श वो नहीं होता जो बदल न सके। जो परिवार से connect न कर पाए, वो “ideal” कैसे हुआ?
मेरा अनुभव:
मेरे घर में भी एक बुज़ुर्ग हैं जो यशोधर बाबू जैसे हैं। पहले मुझे भी लगता था — “यह क्यों नहीं समझते।” पर धीरे-धीरे समझ आया — उनका वो ज़माना था, ये मेरा है। दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है।
इसीलिए — सहानुभूति के साथ देखना ज़रूरी है। न उनकी हर बात मानो, न उन्हें पूरी तरह गलत ठहराओ।
MCQs — सिल्वर वैडिंग
NCERT Vitan | Class 12 | Chapter 1
1. “सिल्वर वैडिंग” कहानी के लेखक कौन हैं?
- (क) फणीश्वरनाथ रेणु
- (ख) मनोहर श्याम जोशी ✅
- (ग) निर्मल वर्मा
- (घ) भीष्म साहनी
2. यशोधर बाबू किस विभाग में काम करते थे?
- (क) रेलवे विभाग
- (ख) शिक्षा विभाग
- (ग) केंद्र सरकार के दफ्तर में ✅
- (घ) बैंक में
3. यशोधर बाबू के जीवन को दिशा देने में किसका सबसे बड़ा योगदान था?
- (क) उनके पिता का
- (ख) उनकी पत्नी का
- (ग) किशनदा का ✅
- (घ) उनके बेटे का
4. “समहाउ इंप्रापर” वाक्यांश किसकी विशेषता है?
- (क) किशनदा की
- (ख) यशोधर बाबू की ✅
- (ग) उनके बेटे की
- (घ) उनकी पत्नी की
5. सिल्वर वैडिंग का अर्थ है:
- (क) सोने की शादी की सालगिरह
- (ख) हीरे की शादी की सालगिरह
- (ग) चाँदी की शादी की सालगिरह — 25 वर्ष ✅
- (घ) लोहे की शादी की सालगिरह
6. यशोधर बाबू की पत्नी का स्वभाव कहानी के अंत तक कैसा हो गया था?
- (क) वो और भी पारंपरिक हो गई थीं
- (ख) वो बच्चों के साथ आधुनिक सोच अपना चुकी थीं ✅
- (ग) वो यशोधर बाबू का साथ देने लगी थीं
- (घ) वो घर छोड़ चुकी थीं
7. किशनदा का जीवन किस बात का प्रतीक था?
- (क) महत्वाकांक्षा और सफलता का
- (ख) सादगी और त्याग का ✅
- (ग) आधुनिकता और बदलाव का
- (घ) पारिवारिक जीवन का
8. यशोधर बाबू को उनके बेटे ने सिल्वर वैडिंग पर क्या उपहार दिया?
- (क) घड़ी
- (ख) पुस्तक
- (ग) Western style का कोट ✅
- (घ) जूते
9. कहानी में यशोधर बाबू की मुख्य समस्या क्या है?
- (क) आर्थिक तंगी
- (ख) बीमारी
- (ग) पीढ़ी के अंतराल से उत्पन्न अकेलापन ✅
- (घ) नौकरी की परेशानी
10. “जो हुआ होगा” वाक्य किस भाव को व्यक्त करता है?
- (क) उत्साह और उमंग
- (ख) नियतिवाद और पलायन ✅
- (ग) क्रोध और विद्रोह
- (घ) प्रेम और समर्पण
11. यशोधर बाबू किशनदा के किस गुण से सबसे अधिक प्रभावित थे?
- (क) उनकी अमीरी से
- (ख) उनकी सादगी और दूसरों की मदद करने से ✅
- (ग) उनके आधुनिक विचारों से
- (घ) उनकी पद-प्रतिष्ठा से
12. कहानी की मूल संवेदना क्या है?
- (क) पाश्चात्य संस्कृति की बुराई
- (ख) पीढ़ी का अंतराल ✅
- (ग) आर्थिक असमानता
- (घ) स्त्री-पुरुष भेदभाव
13. यशोधर बाबू के बच्चे उनसे क्यों असहमत रहते थे?
- (क) क्योंकि वो पढ़े-लिखे नहीं थे
- (ख) क्योंकि उनकी सोच पुरानी थी और बच्चे आधुनिक थे ✅
- (ग) क्योंकि यशोधर बाबू कमाते नहीं थे
- (घ) क्योंकि वो घर पर रहते नहीं थे
14. मनोहर श्याम जोशी ने किस प्रसिद्ध टीवी सीरियल की पटकथा लिखी?
- (क) रामायण
- (ख) महाभारत
- (ग) हम लोग ✅
- (घ) देख भाई देख
15. यशोधर बाबू का चरित्र किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है?
- (क) उच्च वर्ग
- (ख) निम्न वर्ग
- (ग) मध्यवर्ग ✅
- (घ) ग्रामीण वर्ग
